ये कैसे है दुनिया ,ये कैसा है बसेरा !!
यहाँ हर तरफ है अँधेरा हीं अँधेरा ,
जिस तरफ भी जायुं वहां ठगों का है डेरा !!
यहाँ हर मौर पर है ,कोई लुटेरा ,
जिसे मौका मिला उसी ने दाग छोड़ा !!
जहाँ भी डेरा डाला वहीँ लुटा हूँ ,
जिसे भी अपना माना,उसी से लुटा हूँ !!
अंधी एक दौड़ है ,एक अंधी विसात पर ,
जिस पर चली है ये सारी दुनिया !!
कुछ चाह कर भी कुछ पा ना सके ,
कुछ पा कर भी कुछ पा ना सके !!
कुछ पा कर भी कुछ पा ना सके !!
झूठे है कर्म ,झूठे है धर्म ,
झूठे हीं धर्मो पे बसी है ये दुनिया !!
ये कैसी है दुनिया , ये कैसा है बसेरा !!
रवि प्रकाश
०८ -०२ -१०
