Friday, June 4, 2010

ये कैसी है दुनिया , ये कैसा है बसेरा

ये कैसी है दुनिया , ये कैसा है बसेरा

ये कैसे है दुनिया ,ये कैसा है बसेरा !!

यहाँ हर तरफ है अँधेरा हीं अँधेरा ,
जिस तरफ भी जायुं वहां ठगों का है डेरा !!

यहाँ हर मौर पर है ,कोई लुटेरा ,
जिसे मौका मिला उसी ने दाग छोड़ा !!

जहाँ भी डेरा डाला वहीँ लुटा हूँ ,
जिसे भी अपना माना,उसी से लुटा हूँ !!

अंधी एक दौड़ है ,एक अंधी विसात पर ,
जिस पर चली है ये सारी दुनिया !!

कुछ चाह कर भी कुछ पा ना सके ,
कुछ पा कर भी कुछ पा ना सके !!

झूठे है कर्म ,झूठे है धर्म ,
झूठे हीं धर्मो पे बसी है ये दुनिया !!

ये कैसी है दुनिया , ये कैसा है बसेरा !!

रवि प्रकाश
०८ -०२ -१०

2 comments:

  1. bhai mind blowing.... am speechless. what to say your poetry is so good its fantastic....out of the world. please don't stop writing and keep posting.....

    ReplyDelete
  2. Yeah, Rav, good , hope u will continue improving but I am not the right person to tell u to improve but improvement will always lead to culmination.
    Keep postings....................

    ReplyDelete